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उप-शीर्षक साहूकारों के चंगुल से मुक्ति, महिलाओं की आर्थिक संप्रभुता और डिजिटल क्रांति से बदलती गलियों की जमीनी हकीकत

“सुबह की पहली किरण के साथ जो जागता है, जो हमारे दरवाज़े तक रोज़मर्रा की सहूलियतें पहुँचाता है, अक्सर वही समाज की नज़रों में ओझल रह जाता है।” भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक रीढ़ और शहरी जीवन की धड़कन कहे जाने वाले असंगठित क्षेत्र में रेहड़ी-पटरी (स्ट्रीट वेंडर्स) वाले एक अनिवार्य हिस्सा हैं। सुबह की कड़क चाय के ठेले से लेकर, ताजी सब्जियों, फलों, और चाट-पकोड़े की खुशबू तक—ये वेंडर्स सिर्फ सामान नहीं बेचते, बल्कि हमारे शहरी जीवन को गतिमान रखते हैं। लेकिन, कोरोना महामारी के अभूतपूर्व संकट ने इस गति पर अचानक ब्रेक लगा दिया था। जब देशव्यापी लॉकडाउन लगा, तो इस वर्ग की दैनिक कमाई का पहिया पूरी तरह थम गया। बचत के नाम पर कुछ न होने के कारण ये वेंडर्स न सिर्फ घोर आर्थिक तंगी से घिर गए, बल्कि स्थानीय सूदखोरों और साहूकारों के उस क्रूर चक्रव्यूह में फंसने के कगार पर पहुंच गए, जहां से निकलना लगभग नामुमकिन होता है।
इसी ऐतिहासिक संकट के दौर में, एक ऐसी संजीवनी की जरूरत थी जो इन्हें सिर्फ खैरात न दे, बल्कि इनका खोया हुआ स्वाभिमान लौटाए। इसी विज़न के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘पीएम स्वनिधि’ (PM Street Vendor’s AtmaNirbhar Nidhi) योजना की शुरुआत की गई। शुरुआत में यह महज एक आपातकालीन कार्यशील पूंजी ऋण (Working Capital Loan) देने वाली वित्तीय पहल दिखती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों के धरातलीय और जादुई परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि यह योजना सिर्फ एक आर्थिक राहत पैकेज नहीं, बल्कि भारत के सबसे निचले पायदान पर खड़े समाज के लिए एक मूक सामाजिक क्रांति और डिजिटल समावेशन का सबसे बड़ा दस्तावेज बन चुकी है।

साहूकारों के ‘चक्रवृद्धि’ शोषण से मुक्ति और सम्मान का उदय

पीएम स्वनिधि योजना के आने से पहले, हमारे समाज का यह तबका बैंकिंग व्यवस्था के लिए पूरी तरह ‘अदृश्य’ था। औपचारिक साख (Formal Credit) या सिबिल स्कोर न होने के बहाने मुख्यधारा के बैंक इन्हें अपने दरवाज़े से ही लौटा देते थे। मजबूरी में, अपनी रोज़ की पूंजी के लिए ये वेंडर्स स्थानीय साहूकारों या ‘दैनिक उगाही’ करने वाले माफियाओं के चंगुल में फंस जाते थे। ब्याज दरें इतनी क्रूर थीं कि 10% से 20% तक मासिक या कभी-कभी दैनिक ब्याज वसूला जाता था। यानी, सुबह पांच सौ रुपये उधार लो और शाम को छह सौ रुपये चुकाओ! यदि किसी दिन तबीयत खराब हुई या बारिश के कारण दुकान नहीं सजी, तो कर्ज का पहाड़ इस गरीब परिवार को मानसिक अवсад, पारिवारिक कलह और सामाजिक अलगाव की ओर धकेल देता था।
पीएम स्वनिधि ने इस सदियों पुराने शोषक ढांचे की चूलें हिला दीं। बिना किसी गारंटी (Collateral-Free) के सीधे बैंक से ₹10,000 का पहला ऋण मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं था। इसके बाद, समय पर भुगतान करने वाले ‘ईमानदार लेनदारों’ के लिए ₹20,000 और ₹50,000 के क्रमिक ऋण के रास्ते खुल गए। सोने पर सुहागा यह कि समय पर पुनर्भुगतान करने पर मिलने वाली 7% की ब्याज सब्सिडी ने इन्हें एक नई सीख दी। इस वित्तीय व्यवस्था ने रेहड़ी-पटरी वालों के भीतर एक गज़ब का आत्मसम्मान पैदा किया है—अब वे किसी की दया के पात्र नहीं, बल्कि बैंकों के ‘सम्मानित खाताधारक और ग्राहक’ हैं।

आधी आबादी की आर्थिक संप्रभुता और ‘अम्मा’ का आत्मविश्वास

किसी भी सामाजिक नीति की वास्तविक सफलता इस बात से मापी जाती है कि उसने समाज की सबसे कमजोर कड़ी—यानी महिलाओं को कितना सशक्त किया। पीएम स्वनिधि योजना का सबसे खूबसूरत और प्रेरणादायी अध्याय महिला वेंडर्स का उदय है। भारत के हाट-बाजारों में सब्जी बेचती, फूल मालाएं पिरोती या हस्तशिल्प के छोटे-मोटे खोमचे लगाती महिलाएं हमेशा से श्रम तो करती थीं, लेकिन धन पर उनका नियंत्रण नहीं होता था। इस योजना के तहत कुल वितरित ऋणों में महिलाओं की भागीदारी 40 प्रतिशत से भी अधिक रही है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
जब ऋण की राशि सीधे किसी महिला वेंडर के जनधन खाते में ट्रांसफर होती है, तो सिर्फ उसका व्यापार नहीं बदलता, बल्कि परिवार के भीतर उसकी सामाजिक स्थिति और निर्णय लेने की क्षमता (Decision Making Power) बदल जाती है। अब वह अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों में मूकदर्शक नहीं रहती, बल्कि बराबर की हिस्सेदारी निभाती है। स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से जब ये महिला वेंडर्स संगठित हुईं, तो उनमें एक नया सामूहिक नेतृत्व और सुरक्षा का भाव पैदा हुआ। अब वे समाज के हाशिए पर खड़ी ‘बेचारा महिला’ नहीं, बल्कि अपने घर की आर्थिक संप्रभु हैं।

‘हाथ में स्मार्टफ़ोन, होठों पर मुस्कान’ – डिजिटल साक्षरता का लोकतंत्रीकरण

कुछ साल पहले तक नीति विश्लेषकों का मानना था कि डिजिटल और कैशलेस इकोनॉमी केवल महानगरों के वातानुकूलित मॉल या पढ़े-लिखे एलीट वर्ग तक सीमित रहेगी। लेकिन पीएम स्वनिधि ने इस मिथक को मलबे में तब्दील कर दिया। आज भारत के किसी भी सुदूर शहर या कस्बे की तंग गली में चले जाइए, गोलगप्पे बेचने वाले ‘बबुआ’ या चाय बेचने वाले ‘काका’ के ठेले पर टंगा QR कोड इस योजना की सफलता की गवाही देता नजर आएगा।
योजना के तहत वेंडर्स को केवल डिजिटल लेनदेन (UPI) सिखाया ही नहीं गया, बल्कि हर डिजिटल ट्रांजैक्शन पर सालाना ₹1,200 तक के कैशबैक का अनूठा प्रोत्साहन भी दिया गया। इस छोटे से कदम ने एक बड़ा मनोवैज्ञानिक बदलाव किया। डिजिटल लेनदेन के कारण इन वेंडर्स का एक ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ (क्रेडिट इतिहास) तैयार हो रहा है। इसके आधार पर अब बैंक खुद इनके पास बड़े लोन के ऑफर लेकर आ रहे हैं। इस वित्तीय साक्षरता ने रेहड़ी-पटरी वालों को आधुनिक युग की तकनीक से जोड़कर उनके और आधुनिक भारत के बीच की खाई को पाट दिया है।

‘स्वनिधि से समृद्धि’: सिर्फ कर्ज नहीं, सुरक्षा का पूरा आसमान

इस योजना का सबसे क्रांतिकारी मोड़ तब आया जब केंद्र सरकार ने महसूस किया कि केवल व्यापार के लिए पैसे देना काफी नहीं है, जब तक कि इन गरीब परिवारों को सामाजिक सुरक्षा का सुरक्षा कवच न मिले। इसी सोच से जनमा ‘स्वनिधि से समृद्धि’ (SVANidhi se Samriddhi) कार्यक्रम। यह महज एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि एक समग्र कल्याणकारी छाता है।
इसके तहत, ऋण पाने वाले हर वेंडर और उसके परिवार की पात्रता जांची जाती है और उन्हें बिना किसी दफ्तर के चक्कर काटे, केंद्र सरकार की 8 अन्य फ्लैगशिप योजनाओं से सीधे जोड़ दिया जाता है। अचानक कोई बड़ी बीमारी आ जाए तो आयुष्मान भारत है, दुर्घटना हो जाए तो प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, और बुढ़ापे की लाठी बनने के लिए श्रम योगी मान-धन योजना के तहत पेंशन की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा, गर्भवती महिलाओं के लिए मातृ वंदना योजना और राशन के लिए ‘एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड’ को इससे एकीकृत किया गया है। इसने इन परिवारों को किसी भी अचानक आने वाली आपदा के कारण दोबारा गरीबी के दलदल में गिरने से बचा लिया है।

‘अतिक्रमणकारी’ के ठप्पे से मुक्ति और वैधानिक गरिमा

सड़क किनारे दुकान लगाने वालों की सबसे बड़ी त्रासदी पैसा नहीं, बल्कि ‘पहचान का संकट’ और प्रशासनिक प्रताड़ना थी। उन्हें अक्सर स्थानीय निकायों, पुलिस या रसूखदारों द्वारा “अतिक्रमणकारी” या “अवैध तत्व” कहकर खदेड़ दिया जाता था। उनके जीवन में एक स्थायी डर और अनिश्चितता का साया रहता था।
पीएम स्वनिधि ने उन्हें इस मानसिक प्रताड़ना से मुक्ति दिलाई है। योजना का लाभ देने के लिए स्थानीय निकायों (ULBs) द्वारा वेंडर्स को बाकायदा लोकल वेंडिंग सर्टिफिकेट (Certificate of Vending) और पहचान पत्र जारी किए गए। इस एक छोटे से पहचान पत्र ने उन्हें ‘अवैध’ से ‘वैधानिक’ बना दिया। अब वे शहर के विकास में कोई अवांछित बाधा नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के अधिकृत हिस्सेदार हैं। इस पहचान ने उनके बच्चों को बाल श्रम के दलदल से निकाला है, क्योंकि व्यापार में स्थिरता आने से माता-पिता अब बच्चों को काम पर भेजने के बजाय स्कूलों की तरफ भेज रहे हैं।

भविष्य की राह और धरातलीय सुधार

सफलता की इस चमकीली तस्वीर के बीच, हमें भविष्य की चुनौतियों पर भी समसामयिक दृष्टि डालनी होगी। आज भी देश के कुछ पिछड़े और दूरदराज के अर्ध-शहरी इलाकों में जागरूकता की गति धीमी है। कई बार बैंकों के निचले स्तर पर लालफीताशाही या तकनीकी त्रुटियों के कारण वेंडर्स को दूसरी या तीसरी किस्त (₹20,000 और ₹50,000) मिलने में देरी होती है, जिससे उनकी कार्यशील पूंजी टूट जाती है। इसके अलावा, हमारे शहरों के मास्टर प्लान में अभी भी ‘डेडिकेटेड वेंडिंग जोन’ (Dedicated Vending Zones) की भारी कमी है। यदि टाउन वेंडिंग कमेटियों को और अधिक सक्रिय किया जाए, तो यह योजना शहरी नियोजन (Urban Planning) का एक आदर्श मॉडल बन सकती है।

निष्कर्ष: नए भारत का नया आत्मविश्वास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “पीएम स्वनिधि” योजना केवल एक वित्तीय लेन-देन का जरिया नहीं है, बल्कि यह “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के राष्ट्रीय संकल्प को जमीन पर उतारने वाला एक महा-अभियान है। इसने साबित किया है कि देश का विकास तब तक मुकम्मल नहीं हो सकता, जब तक कि पिरामिड के सबसे निचले हिस्से को मजबूती न मिले।
आज जब भारत वर्ष 2047 तक एक ‘विकसित भारत’ के निर्माण के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, तब रेहड़ी-पटरी वालों का यह बदला हुआ स्वरूप इस बात का प्रमाण है कि बदलाव समावेशी है। हाथ में स्मार्टफोन थामे, साहूकारों के डर से मुक्त और अपनी वैधानिक पहचान के साथ गर्व से सिर उठाकर खड़ा रेहड़ी-पटरी वाला नए आत्मनिर्भर भारत का सबसे जीवंत और मुस्कुराता हुआ चेहरा है।
। मृत्युंजय कुमार झा

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